दियाली से दिवाळी तक : जानिए सदियों पुरानी किसानी रिवाज को




राजस्थान में दियाली का त्योहार केवल रोशनी का पर्व नहीं है, बल्कि यह किसानों के लिए अपनी मेहनत के फल को पूजने का अवसर भी है। मरूधरा की संस्कृति में खेती और पशुपालन का गहरा महत्व है, इसलिए यहां की दियाली में ग्रामीण परिवेश की झलक साफ दिखाई देती है। किसान इस समय अपनी खरीफ की फसल काटकर घर लाते हैं और नई फसल की बुवाई की तैयारी करते हैं। सालों से चली आ रही इन परंपराओं में प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भाव छिपा होता है।

दियाली, पटाखे और एतिहासिक पक्ष

    बारूद के पटाखों का धार्मिक या सामाजिक उत्सवों में सबसे पहला इस्तेमाल चीन में हुआ। चूँकि चीन के थाईलेंड कम्बोडिया से राजनयिक और सामाजिक रिश्ते थे सो बारूद के पटाखे वहाँ भी पहुँच गये। 

    थाईलेंड के लोग तो बारूद के रोकेट छोड़ने को हर साल मई में त्योहार की तरह मनाते हैं। दक्षिण पूरब एशियाई देशों में ईद के दिन भी पटाखे चलाने का रियाज़ था जो हालिया सालों में क़ानून बना कर प्रतिबंधित कर दिया है। कुछ लोगों का मानना है कि जब थाईलैंड से वहां के लोग अंगरेजो के साथ 1400 के बाद इण्डिया में घुसे तब अपने साथ ये आतिशबाज़ी वाले त्योहार भी ले आये। थाईलेंडियों को दीवाली के दिन दीये से कोई प्यार नहीं है परन्तु थाईलेंड से लाये हुए पटाखे ये छोड़ नहीं सकते क्यूँकि रिवाज मरते नहीं हैं।

    आपको याद होगा कि 1990 के दशक तक गाँवो में दियाली का मतलब दिया जलाना और हिड़ा(बफोड़ा) जलाना ही था। हिड़ा एक तरह का ग्रोथ होता है जाँटी यानि खेजड़ी के पेड़ पर जिसे सरसों के तेल में भिगो के रखा जाता है फिर उसे जेली में फँसा कर पूरे गाँव के चक्कर लगाये जाते हैं और इसमें सबसे ख़ास बात है कि हिड़े में तेल डलवाने के लिये लड़कों के टोळ गाँव के बनिये के घर ज़रूर जाते हैं ये बताता है कि पहले बनिये तेली ही थे। हमारी दियाली को पहले दिवाली नाम दिया फिर दिवालिया शब्द निकालकर इसे बदनाम करने की कोशिश की। 

    उसके बाद दीये के लिये जबरदस्ती दीपक नाम ढूँढ लिया गया और त्योहार का नाम दियाली (दिए आली) से दीपावली बनाने की असफल कोशिश अभी भी चल रही है। इसे धार्मिक त्यौहार की संज्ञा देने की कोशिश भी खूब रही है जबकि सेन्सकरत ग्रंथो में ना दीपक का ज़िक्र है और बाती के लिये कोई सेन्सकरत शब्द है ना दीये के लिये। इसी तरह वो कौन लोग थे जिन्होंने दीये की जगह लाइट वाली लड़ियों का इस्तेमाल शुरू किया।


खेती और धान्य पूजन का संगम

    राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में दिवाली के दिन अन्न और अनाज की पूजा विशेष रूप से की जाती है। किसान अपने कोठार यानी अनाज भंडार को साफ करते हैं और वहां दीपक जलाते हैं। माना जाता है कि भंडार घर में धान्य का वास होता है, इसलिए नई फसल जैसे बाजरा, मूंग और मोठ को पूजा के स्थान पर रखा जाता है। कई जगहों पर गोबर पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है, जो पशुधन और खेती की सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है।


खेतों में दीया जलाने की रस्म

    दियाली की रात यानी अमावस को राजस्थान के कई हिस्सों में किसान अपने खेतों में जाकर दीया जलाते हैं। इसे खेत की रखवाली और अगली फसल की खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। किसानों का मानना है कि खेत की मिट्टी ही उनका असली धन है, इसलिए वे मिट्टी की पूजा करते हैं। कुछ इलाकों में जल स्रोतों और कुओं पर भी दीपक रखे जाते हैं ताकि खेती के लिए पानी की कमी न हो और आने वाला साल समृद्धि लेकर आए।


पशुओं का श्रृंगार और हिंगलाज पूजा

    खेती में मददगार रहने वाले बैलों को इस अवसर पर खास तौर से सजाया जाता है। उनके सींगों पर रंग लगाया जाता है और गले में घंटियां बांधी जाती हैं। दीपावली के अगले दिन यानी रामा सामा के अवसर पर पशुओं को नए कपड़े और आभूषण पहनाए जाते हैं। मारवाड़ और शेखावाटी के क्षेत्रों में खेती के औजारों जैसे हल और कुदाल की भी सफाई कर उनकी पूजा की जाती है, जिसे हिंगलाज माता की पूजा का हिस्सा माना जाता है।


परंपरागत पकवान और उल्लास

    इस त्योहार पर राजस्थान के गांवों में बाजरे की खींच और चूरमा जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। फसल कटने की खुशी में किसान आपस में मिठाइयां बांटते हैं। इस दौरान ग्रामीण अंचलों में लोक गीतों का आयोजन होता है, जिसमें अच्छी बारिश और बंपर पैदावार के लिए देवताओं को धन्यवाद दिया जाता है। यह परंपराएं आज भी आधुनिकता के दौर में राजस्थान की मिट्टी की खुशबू को बरकरार रखे हुए हैं।

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