राजस्थान में करवा चौथ के साथ ही साल भर की चार बड़ी चौथ का विशेष महत्व माना गया है। मारवाड़ी समाज में महिलाएं इन चारों व्रतों को पूरी श्रद्धा और एक समान नियमों के साथ मनाती हैं।(Rajasthan karwa chauth festivals four chauth importance marwari tradition culture rituals significance in hindi)
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राजस्थान की संस्कृति और परंपराएं देशभर में सबसे अलग और खास मानी जाती हैं। यहां केवल सुहाग का पर्व करवा चौथ ही नहीं, बल्कि साल भर में आने वाली चार प्रमुख चौथ का विशेष महत्व होता है। मारवाड़ी समाज की महिलाएं इन चारों चौथ को एक समान श्रद्धा और विश्वास के साथ मनाती हैं। इन व्रतों में नियम और पूजा की विधि लगभग एक जैसी ही होती है, जो राजस्थान की अटूट धार्मिक आस्था को दर्शाती है।
मारवाड़ी परंपरा में चार बड़ी चौथ
राजस्थान के मारवाड़ी परिवारों में चार प्रमुख चौथ मनाई जाती हैं। इनमें सबसे पहली करवा चौथ है, जो कार्तिक मास में आती है। इसके बाद माघ महीने में आने वाली सकट चौथ (तिलकुट चौथ), वैशाख की चौथ और भाद्रपद मास की बड़ी चौथ (कजली तीज के आसपास) शामिल है। मारवाड़ी महिलाएं इन चारों ही चतुर्थी को बड़ा पर्व मानती हैं और इनमें चांद को अर्घ्य देकर ही व्रत खोला जाता है।
व्रत के नियम और पूजा की विधि
इन चारों व्रतों में महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करने के बाद व्रत का संकल्प लेती हैं। पूरे दिन निराहार रहकर शाम को भगवान गणेश और चौथ माता की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान कहानी सुनी जाती है और हाथ में गेहूं के दाने रखे जाते हैं। मारवाड़ी घरों में इन चारों पर्वों पर विशेष पकवान बनाए जाते हैं जिनमें चूरमा, सुहाली और अलग-अलग तरह के मिष्ठान शामिल होते हैं।
करवा चौथ और अन्य चौथ में समानता
करवा चौथ पर जहां पति की लंबी उम्र की कामना की जाती है, वहीं अन्य चौथ पर परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की कुशलता की प्रार्थना होती है। मारवाड़ी समाज में यह मान्यता है कि बिना इन चारों चौथ के व्रत के सुहाग की पूजा अधूरी रहती है। यही कारण है कि जितना महत्व करवा चौथ को दिया जाता है, उतना ही सम्मान अन्य तीन चौथ को भी मिलता है।
चंद्र दर्शन और अर्घ्य का महत्व
इन सभी व्रतों की पूर्णता चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही होती है। अर्घ्य देने के लिए चांदी के लोटे या मिट्टी के करवे का प्रयोग किया जाता है। चंद्रमा को जल चढ़ाते समय विशेष मंत्रों का जाप होता है और इसके बाद ही महिलाएं अपना व्रत खोलती हैं। राजस्थान के ग्रामीण और शहरी इलाकों में आज भी इन चारों चौथ पर सामूहिक रूप से कथा सुनने की भव्य परंपरा निभाई जाती है।
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