शहीद-ए-आजम विचार धारा मंच संस्थापक हरिराम मील का कहना है कि आज वही ऐतिहासिक दिन जब भारत माता के वीर सपूत शहीद ए आजम भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव ने हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया था।इन महान बलिदानों की वीरता और देशभक्ति को एक छोटी सी श्रद्धांजलि अर्पित कर मील ने बताया कि सन् 1931 को इसी दिन औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष में उनकी भूमिका के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा उन्हें (भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव) फांसी दे दी थी।
उस समय लाहौर उच्च न्यायालय के एक प्रतिष्ठत न्यायाधीश सैयद आगा हैदर थे। जिन्होंने 1930 में लाहौर षड्यंत्र मामले में भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी की सजा सुनाने से इनकार कर दिया था। ब्रिटिश सरकार के दबाव के बावजूद उन्होंने नैतिक आधार पर अपना इस्तीफा दे दिया था। और कहा था कि "वह जज है, कसाई नहीं"।
आगा हैदर के हटने के बाद ब्रिटिश सरकार ने अपनी पसंद के अन्य जजों के साथ एक टिषयूनल बनाया, जिसने सजा सुनाई। मंच अध्यक्ष सुनील चौधरी व गजेंद्र धीवा ने कहा कि 23 मार्च का दिन हमारे लिए सिर्फ एक तारीख नहीं बल्कि बलिदान, साहस और देशभक्ति का प्रतीक है।इसी दिन भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु ने देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। उनका त्याग और साहस आज भी हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की ज्योति जलता है।हमें सभी को उनके बलिदान को याद करते हुए हमें भी देश के प्रति अपने कर्तव्य को निभाने का संकल्प लेना चाहिए।
उक्त श्रद्धांजलि सभा में हरिराम मील, सुनील चौधरी, गजेन्द्र धीवा, प्रशांत चौधरी, योगेश, मनोज, चिराग, गौतम, मोहित, अमित, विक्रम व पवन आदि साथी उपस्थित रहे।
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