'सतलुज': दिलजीत दोसांझ की फिल्म ने पाया OTT प्लेटफॉर्म पर नया जीवन, निर्देशक ने कहा- 'बिना किसी कट के मूल रूप में'

 

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हाइलाइट्स:

  • फिल्म का मूल नाम 'पंजाब 95' था, अब 'सतलुज' शीर्षक से रिलीज़

  • निर्देशक हनी त्रेहन ने दावा किया- "फिल्म में कोई कटौती नहीं, कोई समझौता नहीं"

  • केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने 120 से अधिक कट लगाने को कहा था

  • दिलजीत दोसांझ ने कहा- "यह फिल्म उतनी हमारी है, उतनी ही आपकी"


बिना किसी समझौते के मूल स्वरूप में आई फिल्म

लंबे इंतज़ार और कई विवादों के बाद आखिरकार दिलजीत दोसांझ की चर्चित फिल्म 'सतलुज' (पूर्व में 'पंजाब 95') OTT प्लेटफॉर्म ज़ी5 पर रिलीज़ हो गई है। फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिनका 1995 में अपहरण कर लिया गया था और वे कभी वापस नहीं लौटे।

फिल्म के निर्देशक हनी त्रेहन ने सोशल मीडिया पर एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए कहा कि फिल्म को "बिना किसी कट और बिना किसी समझौते" के मूल रूप में पेश किया गया है। उन्होंने इंस्टाग्राम पर लिखा, "यह जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी है, यह उनकी न्याय की लड़ाई है।"


जब सेंसर बोर्ड ने 120 से अधिक कट लगाने को कहा था

फिल्म की रिलीज़ का सफर आसान नहीं रहा। इससे पहले मार्च 2025 में बीबीसी पंजाबी को दिए इंटरव्यू में हनी त्रेहन ने खुलासा किया था कि केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म में 21 कट लगाने के लिए कहा था, जो बाद में बढ़कर 120 से अधिक हो गए। यहां तक कि उन्हें जसवंत सिंह खालड़ा का नाम ही हटाने का निर्देश दिया गया था।

उस समय त्रेहन ने कहा था, "जिन लोगों को फिल्म से कोई आपत्ति है, मैं चाहता हूं कि वे आकर मुझसे बात करें... मैं न्यायपालिका में लड़ने को तैयार हूं, लेकिन अगर आप मुझे अदालत ही नहीं जाने देंगे तो फिर मैं क्या कर सकता हूं?"

शीर्षक बदलने पर क्या बोले निर्देशक?



फिल्म के नाम को लेकर भी कई उलझनें रहीं। हनी त्रेहन ने बताया कि फिल्म का पहला नाम 'घल्लूघारा' था, जिसे बाद में बदलकर 'पंजाब 95' किया गया। अब इसे 'सतलुज' नाम से रिलीज़ किया गया है।

निर्देशक ने इंस्टाग्राम लाइव के दौरान स्पष्ट किया, "हम फिल्म का पुराना नाम नहीं रख सके। अब इसका शीर्षक 'सतलुज' है। यह पूरी फिल्म है, बिना किसी कट के... जैसा हम हमेशा चाहते थे।"


दिलजीत दोसांझ ने क्या कहा?

फिल्म रिलीज़ होने पर दिलजीत दोसांझ ने सोशल मीडिया पर भावुक पोस्ट लिखा। उन्होंने कहा, "आखिरकार आज हमारी फिल्म 'सतलुज' रिलीज़ हो रही है... यह फिल्म जितनी हमारी है, उतनी ही आपकी भी है।"

उन्होंने आगे कहा, "शहीद जसवंत सिंह खालड़ा जी का जीवन हमेशा निस्वार्थ सेवा और प्रेरणा का स्रोत रहा है। यह उनकी कहानी है, यह न्याय के लिए उनके संघर्ष की कहानी है।"

दो दिन पहले इंस्टाग्राम लाइव के दौरान फिल्म के बारे में पूछे गए सवाल पर उन्होंने संकेत दिया था, "बहुतों के मुंह बंद हो जाएंगे। मैंने जो भी फिल्में बनाई हैं, वे रिलीज़ ज़रूर होंगी।"


कौन हैं जसवंत सिंह खालड़ा?

6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित उनके घर से जसवंत सिंह खालड़ा का अपहरण कर लिया गया था। वे एक मानवाधिकार कार्यकर्ता थे और शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रह चुके थे।

खालड़ा ने क्या किया था?

खालड़ा ने जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में मिले अज्ञात शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था। उनका दावा था कि ये लावारिस शव पुलिस की अवैध कार्रवाइयों के गवाह हैं। इनमें से अधिकतर शव पुलिस ही श्मशान घाटों तक लाई थी।

CBI रिपोर्ट में क्या है?

CBI रिपोर्ट के अनुसार, "स्थानीय पुलिस को यह पसंद नहीं आया और उसने उनका अपहरण करने की साजिश रची... उन्हें अवैध हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या कर दी गई और शव को हरिके क्षेत्र की एक नहर में फेंक दिया गया।"


फिल्म की स्टार कास्ट

कलाकारभूमिका
दिलजीत दोसांझमुख्य भूमिका
अर्जुन रामपालमहत्वपूर्ण किरदार
सुविंदर विक्कीसहायक भूमिका
जगजीत संधूसहायक भूमिका
गीतिका विद्या ओहल्यानसहायक भूमिका

क्या खास है इस फिल्म में?

  • 7 फरवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ की घोषणा हुई थी, लेकिन फिर टल गई

  • हनी त्रेहन और दिलजीत दोसांझ ने समझौता किए गए संस्करण का विरोध किया

  • निर्माताओं ने मूल स्वरूप बनाए रखने पर जोर दिया

  • फिल्म पंजाब के कठिन दौर और मानवाधिकारों की गंभीर कहानी पेश करती है


क्यों मायने रखती है यह फिल्म?

यह फिल्म सिर्फ एक बायोपिक नहीं है, बल्कि सत्य और न्याय की लड़ाई का प्रतीक है। जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पंजाब के उस दौर को उजागर करती है, जब मानवाधिकारों का हनन होता था और आवाज उठाने वालों को चुप करा दिया जाता था।

हनी त्रेहन और दिलजीत दोसांझ का यह जुनून कि फिल्म को समझौता किए बिना पेश किया जाए, अपने आप में एक बड़ी बात है। यह फिल्म उन कलाकारों की उस बुलंद आवाज़ को दर्शाती है, जो विवादों और दबावों के बावजूद सच्चाई को पेश करने से पीछे नहीं हटते।

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