हरी चूड़ियों की खनक, लहरिया की रंगत और सुहाग की आस्था… राजस्थान में ऐसे सजता है तीज का त्योहार


राजस्थान में तीज सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि सुहाग, प्रेम, हरियाली और समृद्ध राजस्थानी संस्कृति का उत्सव है। जानिए तीज पर महिलाओं की परंपराएं, हरी चूड़ियां, लहरिया, तीज माता की पूजा और पारंपरिक पकवानों का महत्व।


सावन आते ही बदल जाता है राजस्थान का रंग

सावन की पहली फुहार के साथ ही राजस्थान की धरती जैसे हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। इसी हरियाली के बीच आता है तीज का त्योहार, जो खासतौर पर महिलाओं के लिए खुशियों, श्रृंगार, सुहाग और आस्था से जुड़ा हुआ है। तीज के आते ही घर-आंगन में रौनक बढ़ जाती है। महिलाएं हरे रंग के कपड़े पहनती हैं, हाथों में हरी चूड़ियां सजाती हैं, मेहंदी रचाती हैं और लहरिया की रंग-बिरंगी ओढ़नी से अपने श्रृंगार को पूरा करती हैं।

हरी चूड़ियां और लहरिया—तीज की पहचान

राजस्थान में तीज और हरे रंग का रिश्ता बेहद खास माना जाता है। हरी चूड़ियों की खनक और लहरिया की रंगत तीज के उत्सव को और खूबसूरत बना देती है। महिलाओं का सजना-संवरना केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि इस पर्व की पारंपरिक पहचान है। सोलह श्रृंगार से सजी महिलाएं तीज माता की पूजा करती हैं और अपने सुहाग की लंबी उम्र, परिवार की सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन में प्रेम की कामना करती हैं।

तीज माता की पूजा में झाड़ी का खास महत्व

राजस्थानी लोक परंपराओं में तीज माता की पूजा का विशेष महत्व है। कई जगहों पर झाड़ी को तीज माता का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की जाती है। पूजा के दौरान पारंपरिक तरीके से सामग्री अर्पित की जाती है। भीगे हुए चने और मोठ भी इस परंपरा का हिस्सा हैं। इनके साथ महिलाएं श्रद्धा और विश्वास के साथ तीज माता की पूजा करती हैं। यह परंपरा राजस्थान की उस लोक संस्कृति को दर्शाती है, जहां प्रकृति, आस्था और त्योहार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

गुलगुले और पूरी की खुशबू से महकती है रसोई

तीज का त्योहार हो और घर की रसोई में पकवान न बनें, ऐसा कैसे हो सकता है! राजस्थान में तीज के अवसर पर घरों में गुलगुले और पूरी बनाने की परंपरा भी देखने को मिलती है। गुड़ और आटे से तैयार किए जाने वाले गुलगुले सावन की मिठास को और बढ़ा देते हैं, वहीं गरमागरम पूरी त्योहार की थाली को खास बना देती है। घर में पकवान बनना केवल खाने की तैयारी नहीं, बल्कि परिवार के साथ बैठकर त्योहार मनाने और पुरानी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।

सुहाग, प्रेम और पति की लंबी उम्र की कामना

तीज को सुहाग और दांपत्य प्रेम से जोड़कर देखा जाता है। महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत और पूजा करती हैं। लेकिन तीज का प्रेम केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है। यह पर्व मां-बेटी, बहन-बहन और मायके-ससुराल के रिश्तों में भी अपनापन और मिठास घोलता है। मायके आई बेटियों का स्वागत, उनके लिए नए कपड़े और श्रृंगार का सामान और घर में बनाए गए पारंपरिक पकवान—ये सभी तीज को भावनाओं से जोड़ देते हैं।

लोकगीतों और झूलों के बिना अधूरी है तीज

तीज की बात हो और झूलों का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं। सावन में पेड़ों पर पड़ते झूले और उन पर झूलती महिलाएं तीज की सबसे खूबसूरत तस्वीरों में से एक हैं। लोकगीतों की मधुर आवाज, ढोलक की थाप और महिलाओं का सामूहिक रूप से तीज के गीत गाना राजस्थान की लोक संस्कृति को जीवंत कर देता है।

राजस्थान की संस्कृति का जीवंत उत्सव है तीज

तीज में राजस्थान के रंगों की पूरी झलक दिखाई देती है—लहरिया के रंग, हरी चूड़ियों की खनक, मेहंदी की खुशबू, पारंपरिक पकवानों का स्वाद, लोकगीतों की मिठास और सुहाग की आस्था। यही वजह है कि तीज केवल कैलेंडर में आने वाला त्योहार नहीं, बल्कि राजस्थान की पीढ़ियों पुरानी संस्कृति को जीवित रखने वाला उत्सव है। आज के बदलते दौर में भी जब महिलाएं तीज के पारंपरिक रंग में सजती हैं, तीज माता की पूजा करती हैं और परिवार के साथ मिलकर गुलगुले-पूरी बनाती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे राजस्थान की पुरानी परंपराएं आज भी उतनी ही खूबसूरती से सांस ले रही हैं।

तीज में बसता है राजस्थान का रंग

जहां हरी चूड़ियों में खनकता है सुहाग, लहरिया में झलकता है राजस्थान,

मेहंदी में सजता है प्रेम,और गुलगुले-पूरी की खुशबू में महकती है अपनी मिट्टी।

यही है राजस्थान की तीज-सुहाग, प्रेम, हरियाली, आस्था और संस्कृति का ऐसा उत्सव, जिसमें हर महिला के चेहरे की मुस्कान राजस्थान की खूबसूरत परंपरा की कहानी कहती है।


राजस्थानी में कुछ लाइने हैं ...


सावन की या तीज निराली, 

आज उग्यो है सूरज न्यारो...। 

उमड़-घुमड़ कर आवे बादली,

संग ल्याई तीज सिंजारो.... ।

फिणी और घेवर री सुंगध बढ़ावे ई री शान,

जइया सोना की बढ़ावे सुहागो...

लहरियों ओढू पचरंगो, करू सिंगार,

भरतार जी न लागे अति प्यारो...।


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