21 सितंबर को मनाई जाएगी तेजा दशमी। जानिए जाट समुदाय से जुड़े वीर तेजाजी की कहानी, गौ-रक्षा, नागदेवता को दिए वचन और बलिदान की पूरी गाथा।
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राजस्थान की धरती सिर्फ राजाओं और युद्धों की कहानियों के लिए ही नहीं, बल्कि अपने लोकदेवताओं और उनसे जुड़ी लोकगाथाओं के लिए भी प्रसिद्ध है। इन्हीं लोकदेवताओं में एक प्रमुख नाम वीर तेजाजी महाराज का है। हर साल भाद्रपद शुक्ल दशमी को मनाई जाने वाली तेजा दशमी राजस्थान की लोकआस्था का महत्वपूर्ण पर्व है। वर्ष 2026 में तेजा दशमी 21 सितंबर, सोमवार को मनाई जाएगी। वीर तेजाजी को खास तौर पर जाट समुदाय से जुड़ा लोकनायक माना जाता है। राजस्थान की लोकपरंपराओं में उनके जन्म का स्थान नागौर जिले का खरनाल गांव बताया गया है। समय के साथ तेजाजी की वीरता, गौ-रक्षा और वचन निभाने की गाथा राजस्थान के गांव-गांव तक पहुंची और वे लोकदेवता के रूप में पूजे जाने लगे।
कौन थे वीर तेजाजी?
लोकपरंपरा के अनुसार तेजाजी का जन्म खरनाल में ताहरजी और रामकुंवरी के घर हुआ था। कई ऐतिहासिक और लोक-साहित्य संबंधी स्रोत उन्हें जाट समुदाय से जोड़ते हैं। उनकी पहचान एक वीर योद्धा, गौ-रक्षक और वचन के पक्के लोकनायक के रूप में हुई। तेजाजी की सबसे प्रसिद्ध गाथा गायों की रक्षा और नागदेवता को दिए वचन से जुड़ी है।
गायों को छुड़ाने निकले तेजाजी
लोककथा के अनुसार एक बार लाछा गुजरी की गायों को लुटेरे ले गए। गायों को छुड़ाने के लिए तेजाजी आगे बढ़े। इसी दौरान रास्ते में उन्हें एक नाग दिखाई दिया। कथा के अनुसार नाग तेजाजी को डसना चाहता था, लेकिन तेजाजी ने उससे कहा कि पहले वे गायों को छुड़ाने जा रहे हैं। उन्होंने नागदेवता को वचन दिया कि गायों को सुरक्षित छुड़ाने के बाद वे वापस लौटकर उसके सामने उपस्थित होंगे। इसके बाद तेजाजी ने लुटेरों से मुकाबला किया और गायों को छुड़ाने में सफल रहे। इस संघर्ष में उनका पूरा शरीर गंभीर रूप से घायल हो गया था।
शरीर पर घाव थे, फिर भी निभाया वचन
गायों को लाछा गुजरी को सौंपने के बाद तेजाजी अपने वचन के अनुसार वापस नागदेवता के पास पहुंचे।नाग ने जब तेजाजी का घायल शरीर देखा तो कहा कि उनके शरीर पर ऐसा कोई स्थान नहीं बचा जहां वह डस सके। लोकगाथा के अनुसार तेजाजी ने तब अपनी जीभ नाग के सामने कर दी, क्योंकि उनके शरीर का वही हिस्सा घावों से बचा था। नागदेवता ने उनकी जीभ पर डसा और इसी घटना के बाद तेजाजी लोकआस्था में अमर हो गए। राजस्थान की सरकारी कला एवं संस्कृति से जुड़ी जानकारी में भी तेजाजी के गौरक्षा और वचन पालन के लिए किए गए इस बलिदान का उल्लेख मिलता है।
क्यों मनाई जाती है तेजा दशमी?
तेजा दशमी को लोकदेवता तेजाजी के निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन तेजाजी के मंदिरों में पूजा-अर्चना, मेले और धार्मिक आयोजन होते हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भी तेजाजी की लोकआस्था देखने को मिलती है। नागौर के परबतसर में तेजा दशमी के अवसर पर लगने वाला मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है। राजस्थान बोर्ड की इतिहास एवं संस्कृति सामग्री में भी तेजा दशमी के अवसर पर परबतसर में बड़े पशु मेले का उल्लेख मिलता है।
जाट समुदाय से गहरा जुड़ाव, लेकिन आस्था व्यापक
तेजाजी की पहचान जाट समुदाय के वीर लोकनायक के रूप में रही है। कई लोक साहित्य और शोध स्रोत उन्हें जाट परिवार में जन्मा बताते हैं। यही वजह है कि जाट समाज में तेजाजी के प्रति विशेष श्रद्धा देखने को मिलती है।हालांकि आज तेजाजी की लोकआस्था केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। राजस्थान के ग्रामीण और कृषि समाज में अलग-अलग समुदायों के लोग उन्हें लोकदेवता के रूप में मानते हैं। उनकी गाथा में गौ-रक्षा, जीव दया, साहस और वचन निभाने जैसे मूल्य प्रमुख हैं।
तेजाजी की कहानी क्या संदेश देती है?
तेजाजी की लोकगाथा सिर्फ एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि राजस्थान की ग्रामीण संस्कृति में मौजूद वचन, साहस, गौ-रक्षा और कमजोर की मदद जैसे मूल्यों का प्रतीक भी मानी जाती है। उनकी कहानी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, दिए गए वचन को निभाना और जरूरतमंद की मदद करना वीरता की पहचान है। तेजा दशमी 2026 पर राजस्थान के गांवों और कस्बों में एक बार फिर वीर तेजाजी की गाथा, लोकगीत और श्रद्धा के रंग देखने को मिलेंगे।
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