सीकर के गोपीनाथजी को ‘सीकर के राजा’ क्यों कहा जाता है? जानिए बंगाल से घास में छिपाकर लाई गई प्रतिमा, राजा शिवसिंह और 300 साल पुरानी अनोखी परंपरा की पूरी कहानी।
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राजस्थान के हर शहर की अपनी एक पहचान होती है, लेकिन सीकर की पहचान में एक ऐसी कहानी भी दर्ज है, जहां राजगद्दी पर बैठने वाला शासक खुद राजा नहीं, बल्कि भगवान को अपना अधिपति मानता था। शहर के सुभाष चौक स्थित गोपीनाथजी मंदिर इसी अनोखी परंपरा की याद दिलाता है। आज श्रद्धालु प्रेम और आस्था से गोपीनाथजी को ‘सीकर के राजा’ कहते हैं, लेकिन इस संबोधन के पीछे सिर्फ धार्मिक भावना नहीं, बल्कि करीब तीन शताब्दियों पुराना इतिहास है। कहानी बंगाल से शुरू होती है और सीकर तक पहुंचते-पहुंचते राजसत्ता और भक्ति का ऐसा मेल बनाती है, जो आज भी शहर की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है।
जब भगवान को बचाने के लिए शुरू हुई लंबी यात्रा
इतिहासकार महावीर पुरोहित के अनुसार, मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में बंगाल के बिष्णुपुर क्षेत्र में स्थित गोपीनाथजी मंदिर पर संकट मंडराने लगा था। मंदिर और प्रतिमा को नुकसान पहुंचाए जाने की आशंका के बीच वहां के गोस्वामी महंत ने प्रतिमा को सुरक्षित निकालने का फैसला किया। प्रतिमा को खुले तौर पर ले जाना संभव नहीं था। इसलिए उसे घास के गठ्ठरों के बीच छिपाकर बैलगाड़ी से रवाना किया गया। यह सफर आसान नहीं था। रास्ते में कई जगह शरण नहीं मिली, लेकिन यात्रा रुकी नहीं। आखिरकार करीब 1600 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद गोपीनाथजी की प्रतिमा सीकर पहुंची।
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सीकर में मिली शरण, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई
उस समय सीकर के शासक राव दौलत सिंह थे। मुगल सत्ता से टकराव की आशंका स्वाभाविक थी, इसलिए शुरुआत में उन्होंने प्रतिमा को शरण देने को लेकर असमर्थता जताई। यहीं से कहानी में युवराज शिवसिंह की भूमिका सामने आती है। उन्होंने पिता के सामने तर्क रखा कि जो भगवान पूरी सृष्टि को शरण देते हैं, उन्हें अपने यहां शरण देना सौभाग्य है। आखिरकार उनकी बात मानी गई और गोपीनाथजी को सीकर में स्थान मिला। शुरुआती दौर में प्रतिमा को घास की कुटिया में विराजमान किया गया। एक छोटी-सी कुटिया से शुरू हुई यह मौजूदगी आगे चलकर सीकर की सबसे खास ऐतिहासिक परंपराओं में बदलने वाली थी।
शिवसिंह का संकल्प और सीकर में बना भव्य मंदिर
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समय बदला। युवराज शिवसिंह सीकर के शासक बने तो उनके मन में गोपीनाथजी के लिए भव्य मंदिर बनवाने का संकल्प था। इसी दौर में चांदी से लदे ऊंटों के एक काफिले से जुड़ी घटना ने सीकर को बड़े राजनीतिक संकट में डाल दिया। बताया जाता है कि काबुल से आगरा जा रहे इस काफिले को शिवसिंह ने अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद दिल्ली दरबार नाराज हुआ और सीकर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की स्थिति बन गई। हालात बिगड़ने से पहले जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने हस्तक्षेप किया और संकट टल गया। शिवसिंह ने इस घटना को भी गोपीनाथजी की कृपा माना। इसके बाद संवत 1781 में सुभाष चौक पर गोपीनाथजी के लिए मंदिर का निर्माण करवाया गया।
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मंदिर बनने के बाद इस कहानी का सबसे अनोखा अध्याय शुरू हुआ। राजा शिवसिंह ने गोपीनाथजी को सीकर का राजा घोषित कर दिया। इसके बाद रियासत के शासकों ने स्वयं को उनका सेवक माना।
राजशाही का दौर खत्म हो गया। सीकर बदलकर आधुनिक शहर बन गया। राजमहल और रियासतों की व्यवस्था इतिहास का हिस्सा बन गई, लेकिन गोपीनाथजी से जुड़ी वह परंपरा खत्म नहीं हुई। आज भी सुभाष चौक स्थित मंदिर में श्रद्धालु उन्हें ‘सीकर के राजा’ कहकर पुकारते हैं।
शायद यही इस कहानी की सबसे खूबसूरत बात है—जिस प्रतिमा को कभी घास के बीच छिपाकर सुरक्षा के लिए बंगाल से निकाला गया था, वही आज सीकर की आस्था, इतिहास और पहचान का हिस्सा बन चुकी है। और सीकर की इस परंपरा में एक संदेश भी छिपा है—यहां कभी एक राजा ने अपनी राजगद्दी से ऊपर भगवान को स्थान दिया था।
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