विजय सलगांवकर की आखिरी बाजी में कितना दम? देखें इस रिव्यु में


कुछ फिल्मों के किरदार इतने याद रह जाते हैं कि अगली फिल्म में उनका लौटना ही अपने आप में उत्सुकता पैदा कर देता है। विजय सलगांवकर भी ऐसा ही किरदार है। ‘दृश्यम’ की पिछली दोनों फिल्मों में अपनी सूझबूझ से पुलिस को उलझाने वाला विजय अब एक बार फिर पर्दे पर है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उसके सामने सवाल पूछने वाला भी कम चालाक नहीं है।

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    ‘दृश्यम 3’ कहानी को वहीं से पकड़ती है, जहां विजय की पुरानी जिंदगी खत्म हुई लगती थी। परिवार सामान्य जिंदगी जी रहा है, लेकिन पुराने मामले की परछाई अभी पूरी तरह हटी नहीं है। एक नई जांच और पुलिस अधिकारी राजवीर सिंह तोमर की एंट्री इस शांत जिंदगी को फिर से हिला देती है।

    इस बार कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा 23 जुलाई है। यह तारीख क्यों महत्वपूर्ण है और विजय की पुरानी कहानी से इसका क्या रिश्ता है, फिल्म धीरे-धीरे इसी गुत्थी को खोलती है।


विजय इस बार पहले जैसा नहीं है

    विजय की सबसे बड़ी खासियत हमेशा उसका शांत रहना रही है। तीसरी फिल्म में भी यह बात कायम है, लेकिन किरदार में पहले से ज्यादा सावधानी दिखाई देती है। वह पुलिस के सवालों से घबराता नहीं, तुरंत सफाई देने की कोशिश नहीं करता और हर परिस्थिति को पहले समझने की कोशिश करता है।

    यही वजह है कि फिल्म देखते हुए कई बार दर्शक खुद भी अंदाजा लगाने लगते हैं कि विजय के पास आखिर कौन-सा जवाब तैयार है। लेकिन इस बार उसके सामने राजवीर है, जो पुराने मामले को नए तरीके से देखने की कोशिश करता है।


राजवीर की एंट्री से बदला पूरा खेल

    जयदीप अहलावत ने राजवीर सिंह तोमर के किरदार में फिल्म को एक अलग तरह का तनाव दिया है। राजवीर का अंदाज शोर-शराबे वाला नहीं है। वह धीरे-धीरे केस की परतें खोलता है और विजय के आसपास मौजूद छोटी-छोटी बातों को जोड़ने की कोशिश करता है।

    यही वजह है कि फिल्म का असली मुकाबला पुलिस और अपराधी के बीच कम और दो दिमागों के बीच ज्यादा महसूस होता है। कौन पहले दूसरे की चाल समझेगा, यही सवाल कहानी को आगे बढ़ाता है।


अजय देवगन की एक्टिंग क्यों काम करती है?

    अजय देवगन ने विजय को बहुत ज्यादा एक्सप्रेशन देने वाला किरदार नहीं बनाया है। यहां उनकी खामोशी ही सबसे बड़ा हथियार है। कई सीन में विजय कुछ नहीं कहता, लेकिन कैमरा उसके चेहरे पर टिका रहता है। उस वक्त दर्शक भी यही सोचता है कि क्या विजय के पास कोई नई योजना है या इस बार मामला सच में उसके हाथ से निकल रहा है।

    अजय की यही नियंत्रित एक्टिंग फिल्म के सस्पेंस को बनाए रखने में मदद करती है।  तब्बू भी मीरा के किरदार में पुराने दर्द और अधूरे सवालों को आगे लेकर आती हैं। वहीं जयदीप अहलावत के साथ अजय के आमने-सामने वाले सीन फिल्म के सबसे मजबूत हिस्सों में शामिल हैं।


कहानी की सबसे बड़ी ताकत और कमजोरी

    फिल्म की अच्छी बात यह है कि यह सिर्फ पिछली फिल्मों के सफल फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश नहीं करती। पुरानी घटनाओं को आधार बनाकर कहानी में नई जांच और नए सवाल जोड़े गए हैं। लेकिन यहीं फिल्म थोड़ी कमजोर भी पड़ती है।

    पहले दो हिस्सों में विजय की योजनाएं जितनी बारीकी से बुनी हुई महसूस होती थीं, तीसरे भाग में कुछ घटनाएं थोड़ी आसानी से आगे बढ़ती नजर आती हैं। कुछ जगह दर्शक अनुमान लगा सकता है कि अब आगे क्या होने वाला है। फिर भी फिल्म पूरी तरह अपनी पकड़ नहीं छोड़ती, क्योंकि कहानी बार-बार विजय और राजवीर के मुकाबले पर वापस आ जाती है।


परिवार की कहानी से ज्यादा जांच पर फोकस

‘दृश्यम’ की पिछली फिल्मों में परिवार का भावनात्मक पक्ष काफी मजबूत था। तीसरे भाग में भी परिवार कहानी का हिस्सा है, लेकिन इस बार कैमरा ज्यादा समय जांच और पुराने केस पर रहता है। इसलिए अगर आप फिल्म से पिछली फिल्मों जैसा पारिवारिक इमोशन ढूंढ रहे हैं, तो आपको थोड़ा अंतर महसूस होगा। इसके बदले फिल्म आपको ज्यादा क्राइम, जांच और माइंड गेम देती है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर असर छोड़ता है

इस तरह की फिल्म में संगीत से ज्यादा जरूरी माहौल होता है और बैकग्राउंड स्कोर यहां उस माहौल को बनाने में सफल रहता है। कई बार आपको अंदाजा होता है कि सीन किसी बड़े मोड़ की तरफ जा रहा है, लेकिन संगीत उस बेचैनी को और बढ़ा देता है। यही चीज कई सामान्य दृश्यों को भी थोड़ा ज्यादा प्रभावी बना देती है।

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